लखनऊ के ब्राह्मण सम्मेलन से बदले सियासी समीकरण?*
2027 से पहले सपा की 'सॉफ्ट हिंदुत्व' रणनीति ने बढ़ाई भाजपा की चिंता

*लखनऊ के ब्राह्मण सम्मेलन से बदले सियासी समीकरण?*
2027 से पहले सपा की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ रणनीति ने बढ़ाई भाजपा की चिंता
*लखनऊ। संवाददाता*
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। राजधानी लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण सम्मेलन में उमड़ी भीड़ ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। सम्मेलन में वैदिक मंत्रोच्चार, हवन-पूजन, गायत्री मंत्र के पाठ, शंखनाद और बटुक ब्राह्मणों द्वारा शिव तांडव की प्रस्तुति ने यह संदेश देने की कोशिश की कि समाजवादी पार्टी अब अपनी पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों पर भी जोर दे रही है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, सम्मेलन के बाद भाजपा संगठन भी ब्राह्मण समाज के बीच संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। चर्चा है कि पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ ब्राह्मण नेताओं को समाज के प्रबुद्ध वर्ग से लगातार संपर्क बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी आगामी महीनों में प्रदेशभर में बड़े जनसंपर्क अभियान की तैयारी कर रही है। यह भी चर्चा है कि सितंबर में अखिलेश यादव मथुरा से एक राजनीतिक यात्रा शुरू कर सकते हैं, हालांकि इस संबंध में अभी तक पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है।
*ब्राह्मण वोट क्यों है अहम?*
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता राज्य की कुल आबादी का लगभग 10 से 12 प्रतिशत माने जाते हैं। कई चुनावी अध्ययनों के अनुसार उनका प्रभाव 100 से 115 विधानसभा सीटों पर निर्णायक या महत्वपूर्ण माना जाता है।
*क्षेत्रवार प्रभाव*
– पूर्वांचल: वाराणसी, प्रयागराज, जौनपुर, चंदौली, गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज और आसपास के जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है।
– अवध और मध्य यूपी: लखनऊ, अमेठी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और रायबरेली क्षेत्र में भी ब्राह्मण वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
– पश्चिमी उत्तर प्रदेश: सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और आसपास की कई सीटों पर संख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद ब्राह्मण मतदाता चुनावी समीकरण बनाने और बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।
2027 के चुनाव को देखते हुए यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। आने वाले महीनों में भाजपा, समाजवादी पार्टी और अन्य दल इस वर्ग को साधने के लिए अपनी रणनीतियों को और धार दे सकते हैं।> नोट: सम्मेलन में भीड़, उसके राजनीतिक प्रभाव और विभिन्न दलों की रणनीतियों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दावे और आकलन सामने आते हैं। इनके वास्तविक चुनावी प्रभाव का आकलन आगामी राजनीतिक घटनाक्रम और चुनाव परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
प्रशांत त्यागी




