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राम’ वोट दिलाते रहे… ‘रामराज्य’ आज भी इंतज़ार में!*

बड़ा सवाल! भगवान श्री राम के नाम पर वोट लेकर क्या उनके आदर्श पर राजनीतिक पर क्या चल रहे हैं

‘ *राम’ वोट दिलाते रहे… ‘रामराज्य’ आज भी इंतज़ार में!*

विशेष टिप्पणी | प्रशांत त्यागी

*नई दिल्ली। संवाददाता*

भारतीय राजनीति में भगवान श्रीराम का नाम दशकों से सबसे प्रभावशाली राजनीतिक प्रतीकों में से एक रहा है। चुनावी मंचों से लेकर जनसभाओं और घोषणापत्रों तक, लगभग हर प्रमुख राजनीतिक दल ने किसी न किसी रूप में राम और राम मंदिर के मुद्दे को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया है। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या श्रीराम केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह गए हैं, या उनके आदर्शों को भी राजनीतिक जीवन में उतारा जा रहा है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक ओर भारतीय जनता पार्टी ने श्रीराम और अयोध्या आंदोलन को अपनी वैचारिक पहचान का प्रमुख आधार बनाया, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दलों ने समय-समय पर अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के अनुरूप इस विषय पर अलग-अलग रुख अपनाया। इन बदलते रुखों को लेकर लगातार बहस होती रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीराम भारतीय संस्कृति में मर्यादा, सत्य, त्याग, न्याय, करुणा और लोककल्याण के प्रतीक माने जाते हैं। यदि राजनीतिक दल वास्तव में उनके आदर्शों का अनुसरण करें, तो राजनीति में शुचिता, जवाबदेही और जनसेवा का स्तर और मजबूत हो सकता है। लेकिन चुनावी राजनीति में अक्सर श्रीराम का नाम वैचारिक और भावनात्मक मुद्दे के रूप में अधिक दिखाई देता है।

इसी बीच आम जनता के बीच भी यह चर्चा होती रहती है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कई नेता वर्षों की राजनीति के दौरान अत्यधिक संपत्ति के मालिक बन गए हैं। हालांकि किसी भी जनप्रतिनिधि की संपत्ति में वृद्धि का आकलन उसके चुनावी शपथपत्रों, आय के स्रोतों और जांच एजेंसियों के उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। बिना प्रमाण किसी दल या नेता पर अवैध रूप से संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाना उचित नहीं माना जा सकता।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि लोकतंत्र में मतदाताओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि राजनीतिक दल केवल धार्मिक प्रतीकों का उपयोग न करें, बल्कि श्रीराम के आदर्श—सत्य, मर्यादा, न्याय, सेवा और सुशासन—को अपने व्यवहार और नीतियों में भी उतारें। यही लोकतंत्र और जनविश्वास दोनों को मजबूत करेगा।कुछ अन्य प्रभावशाली व्यंग्यात्मक हेडिंग:

राम के नाम पर सत्ता, राम के आदर्शों पर सन्नाटा

जय श्रीराम के नारे गूंजे, रामराज्य का सपना अब भी अधूरा

राम चुनाव में सबसे बड़े ‘स्टार’, आदर्श सबसे बड़े लाचार?

हर चुनाव में राम याद आए, चुनाव के बाद आदर्श भूल गए?

राम का नाम सबका, राम के सिद्धांत किसके?

प्रशांत त्यागी

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