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पंचायत चुनाव पीछे टालना , भाजपा के लिए बन सकता है बड़ी मुसिबत !

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में  बढ़ सकता है भगदड़ का खतरा

पंचायत चुनाव पीछे टालना , भाजपा के लिए बन सकता है बड़ी मुसिबत !

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में  बढ़ सकता है भगदड़ का खतरा

पंचायत चुनाव समय पर हो तो प्रदेश में भाजपा ब्लाक तक साध सकती थी जातीय समीकरण

 

 

 

 

 

लखनऊ, संवाददाता

 

विवादों और आपसी गुटबाजी के भवर में फंसी भाजपा पंचायत चुनाव से दूरी बनाकर 2027 को फतह करने की तैयारी में जुटी हुई है। जिसके चलते पंचायत चुनाव को पीछे टालने की तैयारी चल रही है। लेकिन सियासी पंडितों की माने तो भाजपा का यह दांव उल्टा पडता दिख रहा है । इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा पंचायत चुनाव संपन्न करा कर ब्लॉक प्रमुख की और जिला पंचायत अध्यक्ष के पदों के माध्यम से जातीय संतुलन को साध पार्टी कार्यकर्ताओं में बढ़ रही असंतुष्टि और गत बड़ी पर का विराम लगा सकती थी। इतना ही नहीं पंचायत चुनाव की वजह से 2027 तक कार्यकर्ता पार्टी के साथ भी खड़े नजर आते। लेकिन जिस प्रकार से पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश की आबो हवा बदली है और ब्राह्मण, पिछड़े समाज की नाराजगी, यूजीसी विवाद, सत्ता और संगठन में गुटबाजी, दिल्ली और लखनऊ की लड़ाई, जिले से लेकर लखनऊ और लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भाजपा का दो फाड़ हो जाना, पार्टी कार्यकर्ताओं की सुनवाई न होना और संगठन का कमजोर होना, बूथ अध्यक्ष तक का पार्टी के लिए कामना करना और सबसे बड़ी बात एस आई आर सर्वे में हुई पार्टी की फजीहत समेत कई मुद्दों के भवर में बीजेपी ऐसी फंसी है की 2027 का चुनाव आसान नजर नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं पार्टी के सबसे मजबूत वोट बैंक माने जाने वाले स्वर्ण समाज के वोटरों में जिस प्रकार नाराज की है इसके अलावा मध्यम वर्गीय परिवारों में सरकार के खिलाफ पनपता आक्रोश बहुत बड़ा संकेत दे रहा है। अगर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की हवा खराब हो जाती है या कहा जाए कि भाजपा की लहर कमजोर पड़ जाती है, तो पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में जो भगदड़ मचेगी उसका बीजेपी के शीर्ष आला कमान ने भी नहीं सोचा होगा। इतना ही नहीं विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा के कई विधायक भी अगर पाला बदल जाए तो यह बड़ी बात नहीं होगी। क्योंकि जिस प्रकार से अर्श से लेकर शीर्ष तक भाजपा कार्यकर्ता संगठन और सरकार से नाराज हैं इसकी भनक तक भी पार्टी को नहीं है। जिसके चलते अगर समय से ही पंचायत चुनाव बीजेपी कर लेती है तो इन सभी विवादों पर काफी हद तक विराम लग सकता था। इतना ही नहीं जातीय समीकरण के माध्यम से भाजपा ब्लाक प्रमुख जिला पंचायत अध्यक्ष बनाकर कहीं ना कहीं अपने खिलाफ पनप रहे आक्रोश को काफी हद तक रोक सकती थी। लेकिन भाजपा का एक धड़ा ऐसा है जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोई यह मैसेज दे रहा है कि पंचायत चुनाव टालकर 2027 का चुनाव आराम से जीत सकते हैं। उनका तर्क है कि अगर पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले हो जाता है तो ऐसे में गांव-गांव में गुटबाजी बढ़ेगी जिससे 27 के चुनाव पर फर्क पड़ सकता है। लेकिन उन नेताओं को शायद यह नहीं मालूम की पंचायत चुनाव हर राजनीतिक दल के समर्थकों कार्यकर्ता के बीच भी होता है। हर गांव में जातीय और आरक्षण के आधार पर सीट रिजर्व होती है जिसका विधानसभा चुनाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि विधानसभा चुनाव विचारधारा पर होते हैं और राजनीतिक दलों के अपने एजेंडे होते हैं जिसका पंचायत चुनाव से कोई लेना-देना नहीं होता। लेकिन सरकार का डर विपक्ष की एक बड़ी जीत बनता जा रहा है। अगर पंचायत चुनाव समय पर नहीं कराए जाते तो विपक्ष जनता के बीच एक सीधा मैसेज देगा कि उत्तर प्रदेश सरकार हार से डर रही है, जो भाजपा के लिए एक बड़ा नुकसान बनाकर साबित होगा। अगर समय रहते भाजपा पंचायत चुनाव करा ले जाती है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर जिले से लेकर विकासखंड तक जातीय समीकरण के माध्यम से अपने आप को उत्तर प्रदेश में मजबूत कर सकते हैं। लेकिन अगर पंचायत चुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराए जाते हैं तो भाजपा के लिए एक बड़ा खतरा और संकेत यह है कि अगर पार्टी कमजोर पड़ती है और पार्टी विरोधी लहर उत्तर प्रदेश में चलती है तो भाजपा में भगदड़ तय मानी जा रही है। क्योंकि जो पार्टी कार्यकर्ता पंचायत चुनाव ब्लॉक प्रमुख की और जिला पंचायत चुनाव लड़ने का सपना देख रहे हैं यह उनके लिए एक बड़ा झटका होगा, और वह अपने आगामी समीकरण को साधने के लिए दूसरी पार्टी की ओर रुक कर सकते हैं।

 

रिपोर्ट प्रशांत त्यागी

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