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मेहमान का सम्मान हमारी तहज़ीब है, तालिबान की नीति नहीं” — क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने जावेद अख़्तर के बयान पर दिया करारा जवाब** 

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री को लेकर दिया बड़ा बयान

*मेहमान का सम्मान हमारी तहज़ीब है, तालिबान की नीति नहीं” — क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने जावेद अख़्तर के बयान पर दिया करारा जवाब**

 

 

*निष्पक्ष खबर ब्यूरो, देवबंद।*

 

 

मशहूर आलिम ए दीन मौलाना क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने कवि-गीतकार जावेद अख़्तर के हालिया बयान पर तीखा लेकिन सुधारात्मक जवाब देते हुए कहा कि, “देवबंद ने किसी आतंकवादी संगठन का नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री का स्वागत किया, जो भारत सरकार की विदेश नीति के तहत एक आधिकारिक मेहमान थे। जिस चीज़ को कुछ लोग ‘शर्म’ कह रहे हैं, वह दरअसल हिंदुस्तानी तहज़ीब की पहचान — मेहमाननवाज़ी — है।”

 

क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने कहा कि देवबंद की मेहमाननवाज़ी को आतंकवाद का समर्थन बताना नासमझी है। “जो लोग आज हमें ताने दे रहे हैं, उन्हें शायद यह मालूम ही नहीं कि मेहमान क्या होता है। हमारे बुज़ुर्गों ने हमें यह सिखाया है कि मेहमान चाहे किसी भी मज़हब, जात या मुल्क से आए — उसका सम्मान करना हमारी ज़िम्मेदारी है। देवबंद ने वही किया जो एक शरीफ़ हिंदुस्तानी करता है,”।

 

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्वागत का यह अर्थ नहीं कि देवबंद या भारतीय मुसलमान तालिबान की हर नीति से सहमत हैं। “हम लड़कियों की शिक्षा पर रोक को कभी सही नहीं ठहराते। इस्लाम ने इल्म को हर मर्द और औरत पर फ़र्ज़ किया है। मगर बातचीत और सुधार का दरवाज़ा बंद कर देना किसी समस्या का हल नहीं है,!”

 

क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने जावेद अख़्तर के बयान को ‘भावनात्मक और अधूरी जानकारी पर आधारित’ बताया। उन्होंने कहा कि “जो लोग टीवी स्टूडियो में बैठकर हर मुद्दे पर भाषण देते हैं, उन्हें ज़रा यह भी समझना चाहिए कि देवबंद का किरदार सिर्फ एक संस्था का नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के अदब, इल्म और इख़लाक़ का प्रतीक है। एक मुलाक़ात या स्वागत से देवबंद का इतिहास मिट नहीं जाता।”

 

अंत में क़ारी इसहाक़ ग़ोरा ने जनता से अपील की कि “हमें दूसरों के शोर से नहीं, अपनी तहज़ीब से चलना चाहिए। मेहमान का सम्मान हमारी रगों में है — और सुधार की आवाज़ हमारे दिल में। दोनों को साथ रखना ही असली हिंदुस्तानियत है।”

 

 

प्रशांत त्यागी

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